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- राष्ट्र धर्म भावनापूर्ण वेदामृत (अथर्ववेद)
- जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है
- हिन्दू जगेगा विश्व जगेगा
- चारों वेद और अठारह पुराण हिंदी में
- राष्ट्र धर्म सन्देश
- जीवन संचेतना के लिए पवित्र और महत्वपूर्ण वृक्ष
- संविधान की प्रस्तावना
- भारतीय संविधान
- राष्ट्र
| राष्ट्र धर्म भावनापूर्ण वेदामृत (अथर्ववेद) Posted: 19 Feb 2010 02:09 AM PST ॐ भद्रमिच्छंत ऋषयः स्वर्विदस्त्पो दीक्षामुपनिषेदुराग्रे | ततो राष्ट्रं बलमोजश्च जातं तदस्मै देवा उपसन्नमंतु || प्रकाशमय ज्ञान वाले ऋषियों ने सृष्टी के आरम्भ में लोक कल्याण की इच्छा करते हुए दीक्षापूर्वक तप किया उससे राष्ट्र, बल और ओज की उत्पत्ति हुई इस (राष्ट्र) के लिए देवगण उस (तप और दीक्षा) को अवतीर्ण कर (राष्ट्रिकों अर्थात देशवाशियों में) संस्थित अथवा, समस्त प्रबुद्ध जन इस राष्ट्रदेवता की उपासना करें |
| जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है Posted: 16 Feb 2010 03:46 AM PST जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है, क्योंकि स्वर्ग का मिलना या ना मिलना बाद की बात है ! हमारी यह भारत भूमि स्वर्ग के तुल्य थी, है और रहेगी, बस हमें केवल इसे स्वर्ग बनाए रखने का प्रयास करना है | जय हिंद |
| Posted: 13 Feb 2010 01:51 AM PST हिन्दुओं की चेतना को जगाने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा प्रस्तुत एक सुंदर और मधुर गीत |
| चारों वेद और अठारह पुराण हिंदी में Posted: 13 Feb 2010 12:47 AM PST वेद और पुराण भारतीय संस्कृति और सभ्यता, भारतीय आध्यात्म, जीवन दर्शन, सामाजिक व्यवस्था, आर्थिक सम्पनता, इतिहास आदि के विषय में आवश्यक जानकारी उपलब्ध करातें हैं | इनके गहन अध्ययन के बाद ही हम भारत के विषय में कुछ कह सकते हैं | भारत को पूरी तरह से जानने के लिए इनका अध्ययन अति आवश्यक है | |
| Posted: 11 Feb 2010 01:53 AM PST जीवन प्रत्येक जीव को परमात्मा द्वारा प्रदान की गई सबसे अनमोल वस्तु है, सभी प्राणियों में उसी परमपिता का विद्यमान अंश है। सभी प्राणी प्रकृ्ति की संतान हैं, प्रकृ्ति किसी के साथ भेद-भाव नहीं करती है। जीवन प्रदान करना तथा उसका स्वयं में विलय कर लेना प्रकृ्ति का कार्य है, जिसे वह यथासम्भव निर्बाधित रूप से करती है। परन्तु दुर्भाग्यवश आज मानव प्रकृ्ति के नियमो की निरन्तर अवहेलना करता ही जा रहा है। मानव केवल लोभवश प्रकृ्तिक विनाश को निरन्तर आमन्त्रण दे रहा है। कई प्रकार के वन्य जीव,वनस्पती आदि मानव स्वार्थ के कारण लुप्त हो चुके हैं और कई विलुप्ती की कगार पर हैं, कुछ को तो हम वस्तुओं की तरह उत्पादित कर मार कर खा रहे हैं। खेती और पशुपालन ने मानव को स्थायी और सामाजिक जीवन प्रदान किया है। परन्तु आज हम विकास के नाम पर अपनी इस आधारशिला से ही मुहं फेर रहे हैं। विकास के नाम पर हम प्रकृ्ति का विनाश कर रहें हैं और खुद भी विनाश की ओर अग्रसर हो रहें हैं। विकासवाद की इस अंधी दौड में हम मानवता को कलन्कित करते हुए, पारिस्थितिक सन्तुलन बिगाडते हुए, मानवता के मूल सिद्धांतों का उलन्घन करते हुए केवल अपने अस्तित्व को समाप्ति की ओर ले जा रहें हैं। मांसाहार, भ्रष्टाचार,दुराचार, अनौतिकता, चारित्रिक और वैचारिक पतन और उससे परिवार, समाज, देश और विश्व का पतन विकासवादी औद्योगिकिकरण का ही दुष्प्रभाव है। '''Global Warming,''' अनियमित बाढ, सूखा, भूकम्प, चक्रवात, सूनामी आदि केवल धर्म विरूद्ध तरिके से प्रकृ्ति के साथ छेड-छाड का ही परिणाम है। इस विषय पर एक छोटी सी कहानी इस प्रकार है- किसी पहाडी पर एक छोटा सा प्राकृतिक जल स्रोत था, जिससे निरन्तर स्वच्छ जल निकल कर नीचे एक कुण्ड मे एकत्रित होता और उसी से आस-पास के गाँव वालो को पीने का पानी मिल जाता। जल स्रोत के आस-पास जाना सभी के लिये प्रतिबन्धित था, एक युवक प्रतिदिन पानी लेने जाता था, उसने सोचा की अवश्य ही पहाडी पर बहुत सारा पानी है, और हमारे पूर्वज केवल भय, बेवकूफी और आलस्य के कारण ऊपर नहीं गये और सभी को जाने से मना भी किया। मैं पहाडी के ऊपर जाकर, जलस्रोत का छेद बडा कर दूंगा, जिससे अधिक पानी बहेगा और बहकर मेरे गाँव तक पहुँच जायेगा। उसने ऐसा ही किया वह ऊपर गया और जल स्रोत को खोदने लगा, जिससे अधिक पानी आना तो दूर जो आ रहा था वह भी बन्द हो गया। डर के मारे वह भाग आया और उसने किसी को कुछ नहीं बताया। कुछ दिनों में कुण्ड सूख गया, लोग गन्दा पानी पीने को विवश हो गये, और गन्दा पानी पीकर भयानक बीमारियों के शिकार बन गये। बिल्कुल ठीक यही हालत हमारी है, लोभवश हम भी कुछ ऐसा ही कर रहें हैं। लेकिन विश्व को सम्पूर्ण विनाश से बचाने तथा प्राकृतिक और सामाजिक उत्थान हेतु एक सरल उपाय आदिकाल से ही उपलब्ध है, वह है प्राकृतिक तथा सामाजिक नियमों का पालन जो केवल और केवल हिन्दुत्व आचरण द्वारा ही सम्भव है। शुरूआत हमे हमारे देश करनी होगी हिन्दुत्व विचारधारा को देश के साथ राष्ट्र धर्म के रूप में प्रसारित करके ही, हम पहले अपने देश को और फिर पूरे विश्व को संरक्षित सकते हैं। राष्ट्र धर्म का अर्थ है वह धर्म जिसके पालन से पूरे देश का हित हो। उपरोक्त कथनो से कुछ प्रश्नो को जागृत होना संभव जो सम्भवतः निम्न हो सकते हैं। हिन्दुत्व क्या है? हिन्दुत्व एक विचारधारा है जो व्यक्ति को सामाजिक, आध्यात्मिक और प्राकृतिक जीवन आचरण सिखाता है। हिन्दु धर्म का सार युक्त तत्व ही "हिन्दुत्व" कहलाता है। हिन्दु शब्द यूनानियों तथा अरबों द्वारा भारत के मूल निवासियों जो कि वैदिक धर्म का पालन करते थे के लिये प्रयोग किया गया और इसी रूप मे प्रचलित हो गया। यह विश्व क पहला धर्म है। अन्य धर्म किसी महापुरूष के अनुयायियों द्वारा उनकी शिक्षाओं का अनुसरण है, जो शिक्षाएं कहीं न कहीं हिन्दुत्व विचारधारा पर आधारित हैं। सनातन धर्म तो स्वयं सृष्टीकर्ता ब्रह्मा की उत्पत्ति है, इसलिए यह प्राकृतिक धर्म है। श्री भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार - सभी जीवों के साथ सद-भाव रखते हुए, मनुष्य द्वारा इस संसार मे प्रेमपूर्वक रह कर शास्त्रानुसार कर्म करते हुए मुझे प्राप्त करने की विधि ही सनातन धर्म है। योग तथा आयुर्वेद जो सम्पूर्ण विश्व को आरोग्य प्रदान करते है, वैदिक धर्म के ही अंश हैं। सनातन धर्म उस कर्म का सूचक है जो बदला नहीं जा सकता है| यह जीव का शाश्वत अंग है| यह कर्म के नियमों का धर्म है| हिन्दुत्व की पहचान क्या है? द्वार पर गौउ माता,आंगन में तुलसी, मन में प्रभु प्रेम, माथे पर तिलक, माता-पिता, गुरुजनों तथा अतिथी का आदर और सम्मान, बडों का आदर और छोटों से स्नेह,। कर्मयोग का पालन (फल की इच्छा का त्याग कर, कर्त्ता भाव छोड कर, प्रभु को श्रद्धा पूर्ण समर्पित कर्म करना)। शास्त्र नियमानुसार धर्म्, अर्थ, काम और मोक्ष प्रक्रिया का अनुसरण। सभी प्राणियों में परमात्मा का ही अंश है ऐसा समझकर सभी के जीवन का सम्मान करना और उन्हे कष्ट न देना, क्रोध तथा लोभ को त्याग देना, क्षमा करना तथा सदैव दया भाव रखना। मनु ने धर्म के दस लक्षण बताये हैं: धृति क्षमा दमोस्तेयं शौचं इन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो , दसकं धर्म लक्षणम ॥ (धैर्य , क्षमा , संयम , चोरी न करना , शौच ( स्वच्छता ), इन्द्रियों को वश मे रखना , बुद्धि , विद्या , सत्य और क्रोध न करना ये दस धर्म के लक्षण हैं) जो अपने अनुकूल न हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ न करना चाहिये - यह धर्म की कसौटी है। श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रूत्वा चैव अनुवर्त्यताम् । आत्मनः प्रतिकूलानि , परेषाम् न समाचरेत् ॥ (धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो और सुनकर उस पर चलो ! अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये) दया धर्म का आधार है, जिस धर्म में दया का नियम नहीं है, वह धर्म व्यर्थ है, दया के विषय में कबीरदासजी कहते हैं - जहाँ दया वहाँ धर्म है, जहाँ लोभ वहाँ पाप। जहाँ क्रोध वहाँ काल है,जहाँ क्षमा वहाँ आप।। दया किस पर करें इस पर कहते हैं - दया कौन पर किजिए का पर निर्दय होए। सांई के सब जीव हैं, किरि कुन्जर दोए॥ सभी उसी परमात्मा के जीव हैं, चाहे वह कीडा हो या हाथी, परमात्मा के लिए इनमें कोई अन्तर नहीं है, इसलिए सभी जीवों पर दया किजिए। आज के समय मे हिन्दुत्व विचार-धारा का लोप होता जा रहा है, इसकी पहचान तथा अस्तित्व को कैसे अक्क्षुण रखा जाए? आधुनिक समय में हिन्दुत्व एवं धर्म पालन को जटिल तथा पालन में कठिन बता कर कुछ लोगों द्वारा, सभी को हिन्दुत्व विमुख करने का प्रयास निरन्तर जारी है। सरल आचरणों को अपना कर हम हिन्दुत्व को प्रसारित कर समाज, देश्, और विश्व को सुरक्षित कर सकते हैं, सरल हिन्दुत्व का पालन होगा तो, कोई धर्म विरोधी हिन्दुत्व पालन को एक कठिन समस्या बता कर हमें धर्मपथ भ्रमित नहीं कर सकेगा। सरल हिन्दुत्व आचरण से धर्म का भी पालन आसान हो जायेगा, हिन्दुत्व की पहचान पूर्ण रूप से स्थापित हो जायेगी और धीरे-धीरे औद्योगिकिकरण के दुष्प्रभाव भी समाप्त हो सकते हैं। सरल हिन्दुत्व विचार - (१) यदि हम गाय का पालन नहीं कर सकते हैं, तो उनकी रक्षा तथा सेवा करके ही अपने धर्म का पालन कर सकते हैं। प्रतिदिन अपने भोजन में से एक रोटी गौ माता के लिए निकालें, यदि गऊ का मिलना सम्भव ना हो तो 50 पैसे निकाल कर रखें और महिने अथवा वर्ष के अन्त मे किसी गौरक्षक संस्था अथवा गौशाला समर्पित कर दें। यह हमारे लिए, अत्यधिक दुःख और चिंता का विषय है, कि प्रतिदिन हजारों गोवंश को केवल मांस और चमडे आदि के लिए मारा जा रहा है, हमारे पूर्वजों ने जिन गौमाताओं की माता की तरह सेवा करके संरक्षण प्रदान किया उनका और उनके वंश क हनन प्रत्यक्ष रूप से हमारी संस्कृति को नष्ट करने का ही प्रयास है, हमें उनकी रक्षा हेतु सरकार से गौ हत्या को पूर्णतः प्रतिबंधित करना होगा, जिसके लिए हम प्रतिबद्ध हैं| (२) तुलसी हमारी हिन्दु संस्कृति का एक अभिन्न अंग है, हमारे धर्म में तुलसी को भी गाय और गंगा के समान ही माता की मान्यता प्राप्त है। तुलसी का पौधा घर में पवित्रता के साथ कहीं भी लगाया जा सकता है, इसके गुणों के विषय में तो सभी जानते हैं। यदि आप चाहें तो तुलसी के पौधे निशुल्क भी बांट सकते हैं, ऐसा करके आप संघ के सदस्य बन सकते हैं, ऐसा करने पर अपने नाम, पते और फोन न* के साथ हमें सूचित करें। (३) परमात्मा सदैव हर परिस्थिति में हर जगह हमारे साथ है, इसलिए प्रभु पर विश्वास रख उससे प्रेम करें, माथे पर तिलक प्रतिदिन लगायें और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करें। प्रातः उठकर भूमि वन्दन, माता-पिता, गुरूजनों आदि के चरण वन्दन करके ही दिन का आरम्भ करें और उनका आदर भी करें, अतिथी को उचित सत्कार दें तथा अपने से छोटों के प्रति स्नेह रखें। (४) श्री गीता जी में भगवान कहतें हैं कि " मुझे ज्ञानयोग, भक्तियोग द्वारा अथवा कर्मयोग द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, इनमें से कर्मयोग भगवान द्वारा श्रेष्ठ कहा गया है, क्योंकि जीव को प्रत्येक स्थिती में कर्म तो करना ही पडता है, बस करना केवल इतना है कि कर्म और उसका फल भगवान को समर्पित कर देना है। मैं करता अथवा करती हूँ के स्थान पर कहें कि प्रभु करते हैं, बस इतना ही है कर्मयोग| सांसारिक वस्तुओं में आसक्ति न रखना, तथा सब कुछ प्रभु का समझ कर उपयोग करना ही है कर्मयोग| इसलिए प्रभु नाम स्मरण करते हुए कर्म करें| Hello, Hi,Tata Bye ,Good Morning आदि विदेशी शब्दों के स्थान पर अपने धार्मिक अक्षर जैसे नमो नारायण, राधे-राधे, राम राम, जय राम जी की, जय श्री कृष्ण हरे कृष्णा, जय माता दी आदि का प्रयोग करें| इस विषय पर महान संत तुलसीदास जी का भी कहना है - कलयुग केवल नाम आधारा | सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा || कलयुग का बहाना करके न तो गलत करें ना उसका साथ दें| ना ही गलत होने दें क्योंकि कलयुग में भगवान नाम रूप में ही सहायता कर देते हैं | इसलिए सदैव परमात्मा के गुणों का बखान करते हुए कर्म करें | कर्मों में आसक्ति ना रखें| (५) जीवन के चार प्रमुख सोपान हैं जिनका पृथ्वी पर केवल मनुष्य ही इसका पालन कर सकता है, वह हैं धर्मं, अर्थ, काम, मोक्ष परन्तु आज मानव आरम्भ और अंत को भूलकर केवल अर्थ और काम पर केन्द्रित हो गया है, परन्तु बिना आरम्भ मध्य संभव नहीं है और बिना अंत आरम्भ संभव नहीं है| जीवन में चारों का पालन शास्त्र आज्ञानुसार करने में ही मानव का हित है, इसलिए इनका पालन शास्त्र के अनुसार ही करें| (६) जीवन का महत्व हिन्दू धर्मं भली भांति समझता है, इसलिए ही हमारे धर्मं ने हजारों वषों पूर्व ही गाय, बैल, सांप, कौवा, बन्दर अदि विभिन्न जीवों को देव रूप में दिखा कर संरक्षण प्रदान किया है| पीड़ा का अनुभव सभी के लिए समान होता है, चाहे हम हों या कोई अन्य जीव हो| दुर्भाग्य- वश आज हमारे हिन्दू धर्मं में मांसाहार ने अपनी जगह बना ली है, कुछ लोगों का कहना है कि हम किसी मांसाहारी जीव कि तरह किसी को मारते थोड़े ही हैं, हम तो खरीद कर खाते हैं, वह यह भूल जाते हैं कि मांस प्राप्त तो किसी के जीवन का अंत करके ही किया जा सकता और जीवन का सम्मान तो धर्म का मूल है| विश्व में महान कहे जाने वाले महात्मा बुद्ध, सम्राट अशोक, महात्मा गाँधी, सुकरात अदि ने जीवन के महत्त्व को जाना और अहिंसक बनने कि प्रेरणा दी| आज के समय में तो हर समझदार यह मानता है कि "Non voilence is the need of peaceful world" (अहिंसा विश्व शांति के लिए आवश्यक है), लेकिन यदि हम किसी जीव को क्रूरता से मार सकते हैं, तो संभव है की उससे अधिक क्रूर होने पर हम किसी मनुष्य को ही मार दें, शायद यहीं आज हो रहा है| इसलिए पूर्ण अहिंसा आवश्यक है| अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं है क्योंकि अपने से कमजोर कि रक्षा करना बहादुरी है न कि कायरता| कायर तो वे हैं जो अपने से कमजोर, शस्त्रहीन, प्राकृतिक रूप से असहायों पर अत्याचार करते हैं| वीर तो सदैव कमजोर जीवों की रक्षा ही करते है और अत्यचार वालों को दंड देते हैं| मांसाहार से होने वाली हानियाँ १) प्रकांड विद्वान चाणक्य का कहना है कि अपना हित चाहने वाले मनुष्य को ये चार - १. मांस भक्षण २.मदिरा पान ३. पराये धन तथा ४, पराई स्त्री में आसक्ति, को त्याग देना चाहिए यहीं नहीं यह तो जीवन में कभी करने योग्य ही नहीं हैं| २) आज संपूर्ण विश्व के आहार विशेषज्ञ रेशों (fiber) की वृद्धि की बात कर रहे हैं, यह केवल शाकाहार द्वारा ही संभव है क्योंकि मांस और अण्डों में रेशा होता ही नहीं है| आधुनिक विशेषज्ञ अमेरिका के जॉन राबिन्सन लिखते हैं - (क) विश्व में यदि सभी माँसाहारी हो जाएँ तो विश्व के पेट्रोलियम भंडार केवल 13 वर्षों में समाप्त हो जायेंगे, लेकिन सभी शाकाहारी हो जाएँ तो यह 260 वर्षों के लिए पर्याप्त है (ख) एक किलो गेहूं के उत्पादन में 24 लीटर पानी, जबकि 1 किलो मांस के उत्पादन में 2,400-10,000 लीटर पानी लगता है (ग) गेहूं से एक किलो प्रोटीन के लिए 115 रुपये जबकि मांस से 1 किलो प्रोटीन के लिए 1159 रुपये खर्च करने पड़ते हैं| (३) " विश्व स्वाथ्य संगठन " और "खाद्य और पोषण विभाग भारत सरकार " के अनुसार मांस सेवन से कैंसर, हृदय रोग , रक्तचाप, गठिया, तनाव आदि रोग होने की संभावना अधिक हो जाती है| (४) हमारे देश में आज भी 84 करोड़ लोग 20-30 रुपये प्रतिदिन पर निर्वाह करते हैं ऐसे में मांस की कीमत है 200 रुपये प्रति किलो जिससे केवल दो लोगों का ही पेट भर सकता है जबकि 10 रुपये किलो गेहूं से लगभग 20 लोगों का 200 रुपये में पेट भर सकता है| आप ही सोचिये क्योंकि किलो मांस = 20 किलो गेहूं अथवा 15 किलो चावल || क्या उचित है? हमारे बहुत से भाई-बहन केवल अपनी आत्मा को धोखा देते हुए मांसाहार को भगवान से जोड़ देते हैं कहतें हैं - "जीवो जीवस्य भोजनं" (अर्थात जीव ही जीव का भोजन है) यह भगवान द्वारा बनाया नियम है, जबकि वे एक बार भी नहीं सोचते की यदि ऐसा हो तो भी हम मनुष्य इस नियम के अंतर्गत नहीं आते क्योंकि हमारा कोई भी प्रकृति भक्षक नहीं है| कोई हमारे बच्चों को पैदा होते ही नहीं खा जाता है| कुछ भगवान राम के मृग शिकार तथा दशरथ के शिकार का अपवाद देते हैं तो याद रखिये की जिस सीता के कहने पर राम ने हिरण का शिकार किया वह उनसे जीवन दूर हो गयी, दशरथ के बारे में सब जानते हैं, यहाँ पर भगवान ने जीव हिंसा करने वालों के लिए प्रत्यक्ष परिणाम उदाहरण स्वरुप दिखाया है| पश्च्यात धर्मं तथा संस्कृति की देखा देखी न करें क्योकि श्री भगवान कहते हैं - श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात | स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावह: || (गीता ३/३५) (अच्छी आचरण में लाये हुए दूसरे के धर्मं से गुणरहित भी अपना धर्मं अति उत्तम है| अपने धर्मं में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्मं भय को देने वाला है) सभी प्रकार से हमारा धर्मं अन्य धर्मों से श्रेष्ठ है, अपने धर्मं की श्रेष्ठता को समझें तथा उसका आचरणकरें| याद रखें ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन का ह्रास अदि समस्याओं का उदय उन विदेशियों द्वारा ही हुआ है, जो आज श्रेष्ठ समझे जा रहें हैं, परिणाम सभी जानते हैं, सदा बहने वाली नदियों का सूख जाना, नए रेगिस्तानों का निर्माण, समुद्र के जल स्तर में वृद्धि से संसार के कई हिस्सों का जल मग्न हो जाना आदि| जिन संस्कृतियों की संतानों ने इस प्रकार की विकट समस्याएँ खड़ी कर दी हैं उनका अनुसरण तो कदापि न करें| हिंदुत्व विचारधारा को फैलाएं क्योंकि यहीं विश्व के विनाश को रोकने में सक्षम है | आज के गंदे राजनेता हमारे भारत वर्ष को धर्म आरक्षण , जाति आरक्षण , प्रान्त आरक्षण आदि के नाम पर बाँट रहें हैं | कुछ दुष्ट और स्वार्थी तो भगवान राम, रामायण, रामसेतु, जन्मभूमि आदि को वोटों के लिए काल्पनिक तथा मिथ्या ही कहने लगें हैं| स्थिति विकट है हमारे कुछ अपने ही हमारे विरोध में खड़े है| हम सभी हिन्दू परिवार के सदस्य हैं, जब कभी किसी परिवार में उसके सदस्यों की आवश्यकता होती है, वे उपस्थित हो जाते हैं| आज हमें भी अपने देश की अखंडता के लिए, अपने धर्म के लिए , समाज की सेवा के लिए, सामाजिक तथा आर्थिक समानता के लिए, विश्व रक्षा के लिए, अपनी पुण्यभूमि भारत की पुण्यता के लिए, धर्म की पुन: पूर्ण स्थापना के लिए, प्रभु के अवतार से पूर्व धर्म स्तम्भ को बचाए रखने के लिए, असामाजिक तथा अराजक तत्वों के समूल विनाश के लिए, विश्व शांति के लिए, हिंदुत्व प्रसार के लिए एकत्रित होना है| यदि हम एकत्रित नहीं हुए तो पूर्व की भांति फिर लूटें जायेंगें, विदेशियों की विचारधारा हम पर हावी हो जायेगी, कुछ कश्मीर मांग रहें हैं ले लेंगें, कुछ तो पूरा भारत ही निगल लेंगें, धर्म का विनाश भी संभव है , यदि धर्म का विनाश होता है तो विश्व का भी विनाश तय है| परन्तु न तो धर्म का विनाश होगा न ही विश्व का क्योंकि, अभी एक अरब से भी अधिक हिंदुत्व पालनकर्ता विश्व में हैं, उनमें से कुछ थोड़ा पथ भटक गएँ हैं, परन्तु हमें आशा है की वे पुनः धर्ममार्ग पर लौट आएंगें| जब कुछ लाख अंग्रेज पूरे विश्व को अंग्रेजी सीखा सकतें हैं तो क्या हम एक अरब हिन्दू मिलकर हिन्दुत्व का प्रसार नहीं कर सकते ? कर सकते हैं संगठित होकर, ऐसा करने के लिए किसी भी हिन्दू प्रचारक समिति से जुड़िये अथवा हमसे सदस्यता हेतु संपर्क करें! |
| जीवन संचेतना के लिए पवित्र और महत्वपूर्ण वृक्ष Posted: 08 Feb 2010 02:04 AM PST
यह धुएं तथा धूलि के दोषों को वातावरण से सोख कर पर्यावरण की रक्षा करने वाला एक महत्वपूर्ण वृक्ष है | यह २४ घंटे आक्सीजन उत्सर्जित करता है | इसके नित्य स्पर्श से रोग-प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि, मन: शुद्धि , आलस्य में कमी, गृह पीड़ा का शमन, शरीर में आभामंडल की शुद्धि और विचारधारा में धनात्मक परिवर्तन होता है | बालकों के लिए पीपल का स्पर्श बुद्धिवर्धक है |
यह वृक्ष भगवान विष्णु को अति प्रिय है | इसके स्मरण मात्र से गौदान का फल प्राप्त होता है | इसके दर्शन से दुगना और फल खाने से तिगुना पुण्य होता है | आंवले के वृक्ष का पूजन कामना-पूर्ति में सहायक है | कार्तिक में आंवले के वन में भगवान श्री हरि की पूजा तथा इसकी छाया में भोजन पापनाशक है | आंवले से नित्य स्नान लक्ष्मी प्राप्ति में सहायक है | जिस घर में आंवला सदा रखा रहता है, वहां सुख और समृद्धि होती है |
प्रदूषित वायु के शुद्धीकरण में तुलसी का योगदान सर्वाधिक है | तुलसी का पौधा उच्छ्वास में स्फूर्ति ओजोन O3 वायु छोड़ता है, जिसमें आक्सीजन (O2) के दो के स्थान पर तीन परमाणु होते हैं | ओजोन वायु वातावरण के बैक्टीरिया, वायरस, फंगस आदि को नष्ट करके ऑक्सीजन में रूपांतरित हो जाती है | तुलसी उत्तम प्रदूषणनाशक है | तुलसी एक अद्दभुत औषधि है | यह रक्तचाप और पाचन क्रिया का नियमन तथा रक्त की वृद्धि करती है | यह अन्य कई रोगों में औषधि स्वरुप प्रयोग की जाती है |
नीम की शीतल छाया बहुत ही सुखद और तृप्तिकर होती है | नीम में ऐसी कीटाणु नाशक शक्ति मौजूद है कि यदि नियमित नीम की छाया में दिन के समय विश्राम किया जाय तो अचानक कोई रोग होने की संभावना ही नहीं रहती है | नीम के अंग-प्रत्यंग (पत्तियां, फूल, छल, लकड़ी, आदि) औषधि युक्त और उपयोगी होते हैं | इसकी कोंपलों और पकी हुई पतियों में प्रोटीन, कैल्शियम, लोहा और विटामिन " A " पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं | |
| Posted: 30 Dec 2009 01:56 AM PST संविधान के उद्देश्यों को प्रकट करने हेतु प्राय: उनसे पहले एक प्रस्तावना प्रस्तुत की जाती है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना अमेरिकी संविधान से प्रभावित तथा विश्व मे सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। प्रस्तावना के माध्यम से भारतीय संविधान का सार, अपेक्षाएँ, उद्देश्य उसका लक्ष्य तथा दर्शन प्रकट होता है। प्रस्तावना यह घोषणा करती है कि संविधान अपनी शक्ति सीधे जनता से प्राप्त करता है इसी कारण यह 'हम भारत के लोग' इस वाक्य से प्रारम्भ होती है। संविधान है जिस पर कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है। प्रस्तावना इस प्रकार है - ***** हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढाने के लिए, दृढ संकल्प होकर अपने इस संविधान को आज तारीख २६ नवम्बर १९४९ ई* (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छः विक्रमी) को अंगीकृत करतें है।***** |
| Posted: 30 Dec 2009 01:53 AM PST भारत, संसदीय प्रणाली की सरकार वाला एक स्वतंत्र, प्रभुसत्तासम्पन्न, समाजवादी लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। यह गणराज्य भारत के संविधान के अनुसार शासित है। भारत का संविधान, संविधान सभा द्वारा 26 नवम्बर, 1949 को पारित हुआ तथा 26 जनवरी, 1950 से प्रभावी हुआ। 26 जनवरी का दिन भारत में गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत का संविधान दुनिया का सबसे बडा लिखित संविधान है। इसमें 395 अनुच्छेद तथा 12 अनुसूचियां हैं। संविधान में सरकार के संसदीय स्वरूप की व्यवस्था की गई है जिसकी संरचना कुछ अपवादों के अतिरिक्त संघीय है। केन्द्रीय कार्यपालिका का सांविधानिक प्रमुख राष्ट्रपति है। भारत के संविधान की धारा 79 के अनुसार, केन्द्रीय संसद की परिषद् में राष्ट्रपति तथा दो सदन है जिन्हें राज्यों की परिषद् राज्यसभा तथा लोगों का सदन लोकसभा के नाम से जाना जाता है। संविधान की धारा 74 (1) में यह व्यवस्था की गई है कि राष्ट्रपति की सहायता करने तथा उसे सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद् होगी जिसका प्रमुख प्रधान मंत्री होगा, राष्ट्रपति इस मंत्रिपरिषद् की सलाह के अनुसार अपने कार्यों का निष्पादन करेगा। इस प्रकार वास्तविक कार्यकारी शक्ति मंत्रिपरिषद् में निहित है जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री है। मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से लोगों के सदन (लोक सभा) के प्रति उत्तरदायी है। प्रत्येक राज्य में एक विधान सभा है। जम्मू कश्मीर, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक राज्यों में एक ऊपरी सदन है जिसे विधान परिषद् कहा जाता है। राज्यपाल राज्य का प्रमुख है। प्रत्येक राज्य का एक राज्यपाल होगा तथा राज्य की कार्यकारी शक्ति उसमें विहित होगी। मंत्रिपरिषद्, जिसका प्रमुख मुख्य मंत्री है, राज्यपाल को उसके कार्यकारी कार्यों के निष्पादन में सलाह देती है। राज्य की मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से राज्य की विधान सभा के प्रति उत्तरदायी है। |
| Posted: 11 Dec 2009 04:40 AM PST एक जन समूह, जिनकी अपनी एक पहचान होती है, साधारणतः समान भाषा, धर्म, इतिहास, नैतिक आचार, या मूल उद्गम होता है, तथा वे एक निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र मे रहते है, जिसे राष्ट्र कहा जाता है। |
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